प्राचीन भारत में नगर-योजना (कौटिलीय अर्थशास्त्र के विशेष सन्दर्भ में)

 

डाॅ. अर्पिता चटर्जी

एसोशिएट प्रोफेसर, प्रा0भा00सं0 एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू ंतचपजंऋेीतमलं/लंीववण्बवउ 

 

 

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अर्थशास्त्र में नगर योजना सम्बन्धी विविध पक्षों के अवलोकन के उपरान्त निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आचार्य ने इस सम्बन्ध में जो भी सुझाव दिये हैं वे पूर्व परम्पराओं पर ही आधारित हैं। परन्तु उनके व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करने का प्रथम श्रेय उन्हें अवश्य जाता है। कौटिल्य ने नगर योजना में नगरों की सुरक्षा को सबसे पहले प्राथमिकता दी। नगर निवेश के अन्तर्गत विविध वास्तु-संरचनाओं एवं पुर वासियों के वर्ण एवं जातिगत भेद के आधार पर स्थान निर्धारण करते समय आचार्य ने उनके प्रकार्यात्मक उपयोगिता को विशेष महत्त्व दिया। चँूकि नगर राज्य के शौर्य प्रदर्शन का एक माध्यम भी होता था अतः उनके नागरक वास्तु विषयक सन्दर्भों में भव्यता सर्वत्र दिखती है। अर्थशास्त्र में वर्णित नगर-वास्तु सम्बन्धी ये परम्परा आगे भी चलती रही। भले ही विशुद्ध रूप से वास्तु-शास्त्र सम्बन्धी ग्रंथ मौर्य काल के कई शताब्दियों बाद लिखे गये, परन्तु अन्य साहित्य में बिखरे हुए वास्तु शास्त्रीय शब्दों से इस तथ्य की पुष्टि अवश्य होती है। कालान्तर में विशुद्ध रूप से इस विषय परमानसारएवंसमरांगणसूत्रधारजैसे ग्रंथ भी उन्हीं मानकों का निर्वहन करते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नगर योजना वास्तुशास्त्र का अभिन्न अंग है। पुरातात्त्विक तथा साहित्यिक स्रोतों से भारत में नगरों को योजनाबद्ध तरीके से स्थापित किये जाने की सूचना मिलती है। प्राक् सैन्धव काल से ही बसति योजना के कतिपय लक्षण दिखायी देने लगते है। कालीबंगा तथा कोटदीजी की प्राक्-सैन्धव बस्तियों में किलेबन्दी तथा भवनों के योजनाबद्ध निर्माण के कुछ साक्ष्य मिले हैं।1 सैन्धव सभ्यता की तो यह प्रमुख विशेषता ही रही है। सिन्धु सभ्यता के नगर और कस्बे एक निश्चित योजना के अनुसार बसाये जाते थे। इनमें काफी हद तक समरूपता होते हुए भी कुछ स्थानीय विशेषताएँ भी मिलती हैं। प्रमुख पुरास्थलों से पूरब एवं पश्चिम दिशा में दो टीले मिले हैं। इनमें पूर्वी टीले पर नगर क्षेत्र (स्वूमत ब्पजल) जबकि पश्चिमी टीले पर दुर्ग (ब्पजंकमस) के साक्ष्य प्राप्त हुए।2 हड़प्पा, 3 मोहनजोदड़ो4 तथा कालिबंगा5 में दुर्ग नगर-क्षेत्र प्राचीर से युक्त थे। उपर्युक्त से भिन्न लोथल एवं सुरकोटड़ा में अलग-अलग दो टीले नहीं मिले। इन दोनों नगरों के सम्पूर्ण क्षेत्र एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे थे।6 इनसे भिन्न धौलावीरा की अपनी अद्भुत नगर योजना थी। यह नगर तीन मुख्य भागों में विभक्त था, जिसमें दुर्ग भाग, मध्यम नगर एवं निचला नगर सम्मिलित था। ये तीनों भाग एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हुए थे।7

 

नगरों में सड़कों की समुचित योजना थी। प्रायः सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई नगर-क्षेत्र को कई खण्डों में विभाजित करती थीं। कुछ सड़कें बहुत चैड़ी, कुछ साधारण एवं कुछ तंग गलियों जैसी थी। मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़क लगभग 10 मीटर से अधिक चैड़ी थी।8 यहाँ गलियाँ 1.0 मीटर से 2.2 मीटर तक चैड़ी पायी गई।9 सड़कों एवं गलियों में जल एवं मल निकासी हेतु पक्की ईंटों की बनी ढकी नालियाँ सैन्धव नगर-योजना की बड़ी विशेषता मानी जाती है।

 

नगर एवं दुर्ग क्षेत्र में विभिन्न आकार-प्रकार के भवन मिले हैं। भवन निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग हुआ है। यद्यपि कालीबंगा, लोथल एवं रंगपुर में कच्ची ईंटों तथा धौलावीरा एवं सुरकोटड़ा में भवन निर्माण में प्रस्तरों का भी प्रयोग दिखता है।10 ईटें विभिन्न आकार-प्रकार की प्रयुक्त हुयी हैं परन्तु सामान्य आकार 27.94 सेमी 13.97 सेमी 6.35 सेमी की हैं।11 इमारतों के कोनों की चिनाई हेतु अंग्रेजी के एल आकार की ईंटों का तथा कँुओं एवं मेहराबों के निर्माण में फन्नीदार ईंटों का प्रयोग उल्लेखनीय है।12

 

सामान्य आवासीय घरों के साथ इस सभ्यता के नगरों से कई सार्वजनिक उपयोग के भवनों एवं वास्तु के अवशेष मिले हैं जिनमें मोहनजोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र से प्राप्त विशाल स्नानागार, अन्नागार, स्तम्भों पर आश्रित मण्डप, हड़प्पा के एफ टीले से प्राप्त अन्नागार के अवशेष तथा लोथल की गोदी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

नगरीय बस्ती हेतु जल संसाधन के महत्त्व से भी सैन्धववासी पूर्णतः परिचित थे। प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण नगर नदियों के किनारे बसाए गए। मोहनजोदड़ो जैसे पुरास्थल से अनेक कुएँ मिले हैं। धौलावीरा से जल संरक्षण हेतु 16 तालाबों के अवशेष महत्त्वपूर्ण हैं जिनमें वर्षा के जल को एकत्र किया जाता था।13

 

सैन्धव नगर-योजना सम्बन्धी इन विवरणों के आलोक में तद्युगीन नगर निवेश की जिन विशेषताओं का परिज्ञान होता है, उनमें प्रमुख है- नगरों की सुरक्षा की व्यवस्था तथा नगरों की आन्तरिक योजना के अन्तर्गत मार्गों का समुचित प्रबन्ध एवं विविध प्रकार के आवासीय भवनों की स्थिति। उपर्युक्त के साथ-साथ जल संसाधन की प्राकृतिक एवं कृत्रिम व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया गया। उल्लेखनीय है कि ये ही कतिपय बिन्दु आगे भी नगर योजना के प्रमुख आधार स्तम्भ बने रहे।

 

वैदिक काल में भी नगरों की सुरक्षा हेतु उन्हें प्राचीरों से घेरने का प्रचलन रहा। ऋग्वेद में असुरों के सुदृढ़पुरजिसे अधिकांश विद्वान दुर्ग जैसे नगर निर्माण के द्योतक मानते हैं, अनेक बार उल्लेख हैं। एक स्थल पर पुरों को अश्वन्मयीः कहा गया।14 एक स्थल पर अग्नि से प्रार्थना की गई कि वे मनुष्यों की रक्षा के लिए ऐसी पुरी का निर्माण करे जो अजेय एवं सौ स्तम्भों वाले हों।15 अन्यत्र उनके 100 द्वार (शतदुर) का उल्लेख भी मिलता है।16 ऋग्वेद में सहस्रथूण प्रासादों का वर्णन भी हुआ है, 17 जो राजभवन के सभा मण्डप जैसी वास्तु संरचना जान पड़ती है। अष्टाध्यायी में उल्लिखित कतिपय सूत्र भी इस ओर संकेत देते हैं कि उस समय नगरों का सन्निवेश दुर्ग के रूप में होता था। पाणिनि के सूत्र 5.1.16 में नगर निर्माण के लिए सामग्री एकत्र करने तथा सूत्र द्वारा भूमि मापन का संकेत है।18 एक सूत्र में प्रयुक्त परिखाया ´ (5.1.18) शब्द नगर निवेश करते समय दुर्ग के चारों ओर परिखा निर्माण की प्रक्रिया का संकेत करते हैं।19 यद्यपि यहाँ प्राकार शब्द नहीं मिलता।देवपथ’20 शब्द यहाँ अवश्य मिलता है, जो कि अर्थशास्त्र के अनुसार प्राकार का ही एक हिस्सा है।

 

 

पालि साहित्य में पुर या नगर के प्रमुख हिस्सों में परिखा (खाई), प्राकार (परकोटा), द्वार, द्वार-अट्टालक, प्रासाद, गृह, देवस्थान, पुण्यशाला (विश्रामगृह) आपण, उद्यान, पुष्कारिणी आदि के उल्लेख सामान्य हैं। महापथ, वीथी, अंतरवीथी शृंगाटक (चैराहा) आदि शब्द मार्गों की विविध योजनाओं की ओर संकेत देते हैं।21 महाउम्मग्ग जातक में नगर के चतुर्दिक्अट्ठारस हथ्यो पाकारो’ (18 हाथ ऊँचा प्राकार) तथा नगर के मध्य में राज प्रासाद के स्वरूप का विस्तृत वर्णन है।22 बौद्ध साहित्य में राजगृह, कौशाम्बी, वाराणसी, मथुरा आदि अनेक नगरों के नाम मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक काल में नगरों के प्राचीरीकरण का प्राचीनतम उदाहरण कौशाम्बी से प्राप्त होता है।23 इसके अतिरिक्त उज्जैन, वाराणसी (राजघाट), राजगृह एवं चम्पा जैसे प्राचीन नगरों के उत्खनन से भी इनके रक्षा प्राचीरों से घिरे होने की पुष्टि होती है।24

 

मौर्य काल भारतीय कला एवं वास्तु के इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से अति विशिष्ट है क्योंकि इस काल में साहित्यिक स्रोतों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए पर्याप्त पुरातात्त्विक स्रोत उपलब्ध हैं। इनके समीकृत अध्ययन से तद्युगीन नगर-वास्तु के एक विकसित स्वरूप का अभिज्ञान होता है। इनमें कौटिल्य का अर्थशास्त्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह भारतीय साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है, जिसमें वास्तुशास्त्र के सैद्धान्तिक पक्ष को विस्तार मिला। अर्थशास्त्र में वास्तुशास्त्र विषयक जो दिशा-निर्देश दिये गये वे कालान्तर में भी सदैव प्रासंगिक बने रहे। मानसार एवं समरांगणसूत्राधार जैसे ग्रन्थ इसके प्रमाण हैं।

 

प्रस्तुत ग्रन्थ में वास्तु को परिभाषित करते हुए कहा गया है- गृहं क्षेत्रामारामः सेतुबन्धस्तटाकमाधारो वा वास्तुः25 अर्थात् घर, खेत, बाग बगीचे, सीमाबन्ध, तालाब और बाँध आदि सब वास्तु कहलाते हैं। वास्तु के उपर्युक्त परिभाषा से इस विषय के विस्तृत परिधि का ज्ञान होता है। उपर्युक्त समस्त प्रकार के वास्तु के निर्माण सम्बन्धी दिशा-निर्देश आचार्य देते हैं।

 

परन्तु वास्तुशास्त्र के स्रोत के रूप में अर्थशास्त्र का उपयोग करते समय कतिपय कठिनाईयाँ भी आती हैं। प्रथमतः यह ग्रन्थ सूत्र रूप में लिखा गया है, अतः दिये गये विवरण अत्यन्त संक्षिप्त हैं। इसमें प्रदत्त वास्तु विषयक सामग्रियाँ बिखरी हुईं हैं और परस्पर असम्बद्ध हैं। साथ ही बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनसे आज हम अपरिचित हो चुके हैं, अतः उनके अर्थ को पूर्णतः समझ पाना कठिन हो जाता है। इस ग्रंथ की कोई प्राचीन टीका भी उपलब्ध नहीं है, जिससे हमारा मार्गदर्शन हो सके। बावजूद इसके अर्थशास्त्र में नागरक-वास्तु विषयक सामग्रियों को समीकृत करने पर तद्युगीन नगर वास्तु की एक संभावित स्वरूप की कल्पना अवश्य की जा सकती है।

 

अर्थशास्त्र के जनपदनिवेश (दूसरा अधिकरण, प्रकरण 17, अध्याय 1) में विविध प्रकार के बस्तियों का परिज्ञान होता है। ये हैं ग्राम, स्थानीय, द्रोणमुख, कार्वटिक एवं संग्रहण। ग्राम-निवेश सम्बन्धी विविध सैद्धान्तिक बातों को यहाँ आचार्य ने विस्तार दिया है। राज्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थिति राजधानी की होती थी। यह नगर राजा का वासस्थान था, फलतः इसकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना स्वाभाविक था। राजधानी की स्थिति ऐसी होनी चाहिए जो प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित हो। इस प्रसंग में आचार्य ने चार प्रकार के प्राकृतिक दुर्गों की चर्चा की है। परन्तु राजधानी के इतर भी राज्य में अनेक नगर होते थे। साथ ही सभी नगरों को प्राकृतिक दुर्गों के द्वारा सुरक्षित कर पाना संभव था, फलतः अर्थशास्त्र केदुर्गविधानम् प्रकरण’ (द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 19 अध्याय 3) में नगरों के सुरक्षा सम्बन्धी निर्देश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। नगरों की आन्तरिक योजना दुर्गनिवेश (द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 20, अध्याय 4) का प्रतिपाद्य विषय है। निशान्तप्रणिधि (प्रथम अधिकरण, प्रकरण 15, अध्याय 19) में राजप्रासाद तो सन्निधातृनिचयकर्म प्रकरण (द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 21, अध्याय 5) में कोष्ठागार, कोषागार जैसे महत्त्वपूर्ण भवनों के वास्तुगत स्वरूपों को निर्देशित किया गया है जबकि तृतीय अधिकरण के चैसठवें प्रकरण में सामान्य आवासीय भवनों के सन्दर्भ में दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

 

चँूकिजनपदनिवेशमें नगरेतर वास्तु योजना पर प्रकाश पड़ता है अतः इस अध्ययन में इसे विस्तार नहीं दिया गया है।दुर्ग विधानम्में नगरों की सुरक्षा सम्बन्धी  उपाय वर्णित हैं। यहाँ कौटिल्य ने राजधानी नगर के निर्माण के सम्बन्ध में तथा शत्रु से उसकी रक्षा करने के लिए नगर सीमा के चारों ओर नाना प्रकार के दुर्गों के निर्माण का विधान किया है। उन्होंने 4 प्रकार के प्राकृतिक दुर्ग का उल्लेख किया है26-

1.     औदक दुर्ग- चारों ओर पानी से घिरा हुआ टापू के समान गहरे तालाबों से आवृत स्थल प्रदेश, औदक दुर्ग कहलाता है।

2.     पार्वत दुर्ग- बड़ी-बड़ी चट्टानों तथा पर्वत की कंदराओं के रूप में निर्मित दुर्ग, पार्वत दुर्ग कहलाता है।

3.     धान्वन दुर्ग- जल तथा घास-फूस आदि से रहित अथवा सर्वथा ऊसर भूमि में निर्मित दुर्ग, धान्वन दुर्ग कहलाता है।

4.     वन दुर्ग- चारों ओर दलदल से घिरा हुआ अथवा काँटेदार सघन झाड़ियों से परिवृत्त दुर्ग, वन दुर्ग कहलाता है।

 

उपर्युक्त चारों प्रकार के प्राकृतिक दुर्गों के अतिरिक्त आचार्य ने धनोत्पादन के मुख्य केन्द्र बड़े-बड़े स्थानीय कोटि के नगरों के निर्माण का विधान किया है जो निम्नवत् है27-

     वास्तु विद्या के विद्वानों की सहायता से किसी नदी के संगम पर, बड़े तालाब के किनारे या कमल युक्त जलाशयों के तट पर नगर बसाये जा सकते हैं।

     नगर की योजना सुविधानुसार, गोल, लम्बी अथवा चैकोर बनायी जा सकती है। परन्तु आवश्यक यह है कि नदी के चारों ओर छोटी-छोटी नहरों द्वारा पानी का प्रबन्ध अवश्य किया जाय।

     उसके इधर-उधर की भूमि में पैदा होने वाली बिक्री योग्य वस्तुओं का संग्रह तथा उनके विक्रय का प्रबन्ध भी वहाँ होना चाहिए।

     नगर में आने-जाने के लिए जल मार्ग अथवा स्थल मार्ग दोनों की सुविधा होनी चाहिए।

 

नगरों को बसाते समय आचार्य ने जिन बातों पर सर्वाधिक ध्यान दिया वे थीं जल की उचित आपूर्ति एवं मार्गों का समुचित प्रबन्ध। ये दो तथ्य पूर्व से ही नागरक बस्ती की अनिवार्य शर्तें रहीं। आचार्य ने भी उनके महत्त्व को प्रतिपादित किया।

 

 

कौटिल्य ने इन नगरों की सुरक्षा के विषय में जो दिशा-निर्देश दिया है, उन्हें संक्षेप में यहाँ उल्लिखित किया जा रहा है28-

     नगर के चारों ओर एक-एक दण्ड (4 हाथ) की दूरी पर क्रमशः चैदह, बारह और दस दण्ड चैड़ी तीन परिखाओं (खाइयाँ) खुदवानी चाहिए।

     खाई जितनी चैड़ी होगी उससे चैथाई अथवा आधी गहरी होनी चाहिए।

     इन खाइयों की तलहटी बराबर चैरस एवं मजबूत प्रस्तरों से बंधी हो।

     उनकी दीवारें पत्थर अथवा ईंटों से मजबूत बनी हुई हों।

     उनमें जल निकालने का मार्ग अवश्य होना चाहिए।

     खाइयों में कमल के फूल तथा मगरमच्छ आदि रहने चाहिए।

     खात से चार दण्ड की दूरी पर छः दण्ड ऊँचा, सब ओर से मजबूत और ऊपर की चैड़ाई से दुगुनी नींव वाला एक बड़ा वप्र (तंउचंतज) बनाना चाहिए।

यहाँ वप्र के तीन प्रकार उल्लिखित है-

1. उघ्र्वचय (ऊपर पतला)  2. मंचपृष्ठ (नीचे चपटा)  3. कुम्भकुक्षिक (बीच में कुम्भाकार)

     वप्र की नींव मजबूत हो।

     वप्र बन जाने पर उसके ऊपर प्राकार (दीवार) बनवानी चाहिए।

     दीवार की ऊँचाई अधिक से अधिक चैबीस हाथ होनी चाहिए।

     इस दीवार का ऊपरी भाग इतना चैड़ा होना चाहिए जिस पर एक रथ आसानी से चलाया जा सके। इसके अग्रभाग में कपिशीर्षक (ठंजजसमउमदजे) बने हों।

     बड़े-बड़े शिलाखण्डों से प्रकार का निर्माण करवाना चाहिए। लकड़ी का प्राकार कभी भी नहीं बनवाना चाहिए, क्योंकि इसमें सदा आग लगने का भय बना रहता है।

     प्राकार के आगे ऐसी अट्टालिका (बुर्ज) बनवाए जिसकी लम्बाई, चैड़ाई और ऊँचाई प्राकार के बराबर हो। इस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ भी बनवानी चाहिए। ये अट्टालिकाएँ एक दूसरी से तीस दण्ड की दूरी पर हों।

     दो अट्टालिकाओं के बीचप्रतोलीनामक रचना तथा अट्टालिका और प्रतोली के बीच में इन्द्रकोश नामक विशिष्ट स्थान हो जहाँ से धनुर्धारी बाहर की वस्तु देख सकें तथा भीतर से ही निशाना बाँध सकें किन्तु बाहर के लोग उन्हें देख सकें।

     प्राकार के साथ ही एक देवपथ (गुप्त मार्ग) बनाने का भी परामर्श यहाँ दिया गया है।

     प्राकार का मुख्य दरवाजा इतना बड़ा हो कि जिसमें चार हाथी एक साथ प्रवेश कर सकें। इसके अतिरिक्त अन्य द्वारों के विधान भी कौटिल्य देते हैं।

     प्राकार की बाहरी भूमि में शत्रुओं के घुटनों को तोड़ देने वाले लौह कंटक के ढेर, लोहे के जाल, कीलें आदि बनाकर दुर्ग के मार्ग को पाट देना चाहिए।

 

उल्लेखनीय है कि कौटिल्य ने नगरों की सुरक्षा हेतु जिन कृत्रिम उपायों को सुझाया है उनकी कल्पना उन्होंने प्राकृतिक दुर्गों से ही लिया है। उदाहरणार्थ नगरों के चारों ओर परिखा के निर्माण की प्रेरणा औदक दुर्ग से लिया गया जान पड़ता है जबकि नगरों के चतुर्दिक प्राकार एवं बाह्य भूमि को लोहे के जाल एवं कीलों से पाटने की परिकल्पना के पीछे पार्वत दुर्ग एवं वन दुर्ग की अवधारणा कार्य कर रही होगी। 

 

आचार्य ने नगरों की सुरक्षा के लिए जो उपाय सुझाए हैं उनके अनुरूप ही तद्युगीन नगर बसाए गए। इसकी पुष्टि यूनानी लेखकों के विवरणों से होती है। मेगास्थने ने पाटलिपुत्र नगर का जो वर्णन किया है, वो इसके अनुरूप है। तदनुसार यह नगर डेढ़ मील चैड़ा था और 6 मील फैला हुआ था। उसकी परिखा या खाईं 600 फुट चैड़ी और 45 फुट गहरी थी। उसके परकोटे में 64 द्वार और 570 अट्टालक थे। नगर के मध्य में राजप्रसाद था।29 मेगास्थने के अनुसार पालिब्रोथा (पाटलिपुत्र) का प्राकार लकड़ी का बना हुआ था।30 पटना की खुदाई में मिले नगर प्राकार के अवशेष से उपर्युक्त साहित्यिक सन्दर्भ का समर्थन होता है। डी.बी. स्पूनर को कुम्हरार के समीप उत्तर की ओर बुलन्दीबाग की खुदाई में साल की लकड़ी की बनी मजबूत प्राचीर का अवशेष लगभग 450 फुट की लम्बाई तक प्राप्त हुए थे। सर्वप्रथम 1903 में छपी रिपोर्ट में डब्ल्यू वाड्डेल ने इसका उल्लेख किया, परन्तु 1912-13 में स्पूनर द्वारा तथा 1922-1923 से लेकर 1928-29 तक मनोरंजन घोष द्वारा पटना में किए गए उत्खनन के दौरान इस स्थापत्य के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त हुई।31

 

स्पूनर द्वारा की गई खुदाई में लकड़ी के खम्भों की दो समानान्तर दीवारों का ढाँचा मिला था जो 12.5 फुट चैड़ा था। उसके नीचे 22 फुट गहराई में लम्बी चैकोर लकड़ी का बना फर्श मिला जिनके कोने दीवार के खम्भों की चुल्लियों में जड़े हुए थे। खम्भे और भी 5 फुट नीचे उतरते चले गए थे जहाँ फर्श के नीचे वे कंकर की नींव में धँसे थे। लकड़ी के इस प्राकार की सफाई 24 फुट तक ही की गई परन्तु जगह-जगह निरीक्षण के लिए खोदे गये गढ्ढों के अनुसार यह फर्श कम से कम 350 फुट तक लम्बाई में मौजूद था। निश्चय ही दीवार भी इतनी दूरी तक अवश्य थी, जो बाद में नष्ट हो गईं।32

 

श्री मनोरंजन घोष द्वारा समय-समय पर की गई खुदाई से दीवार की परम्परा और अधिक लम्बाई तक देखी गई। परन्तु उनके द्वारा किए गए उत्खनन की सबसे महत्त्वपूर्ण खोज एक लम्बी सुरंग के अवशेष से सम्बन्धित है जिसकी दीवार एवं फर्श लकड़ी के थे यह सुरंग 6 फुट 3 इंच ऊँची और चैड़ाई में 3.5 फुट मिली है। यह सुरंग प्रायः काष्ठ प्राकार के साथ-साथ पाई गई है।33 उल्लेखनीय है कि प्राकार के साथ सुरंग बनवाने का निर्देश कौटिल्य भी देते हैं। प्राचीन पाटलिपुत्र नगर का प्राकार काष्ट का बना है जबकि कौटिल्य ने नगरों को सुरक्षा प्राचीन को सदैव प्रस्तर से बनवाए जाने का सुझाव दिया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पाटलिपुत्र का प्राकारअर्थशास्त्रके रचनाकाल के पूर्व की कृति है। अग्निकाण्ड से काष्ठ प्राचीरों के नष्ट होने की जा बात उन्होंने कही वह निश्चय ही वास्तविक अनुभवों पर आधारित प्रतीत होता है।

 

अर्थशास्त्र में नगर बसति योजना एवं दुर्ग सन्निवेश सम्बन्धी विस्तृत सामग्री उपलब्ध है। इसकेदुर्ग निवेशप्रकरण में नगर बसति योजना के विषय में विस्तार से निर्देश प्राप्त होते हैं।34 तदनुसार-

     वास्तु शास्त्रकारों के निर्देशानुसार जिस भूमि को नगर-निर्माण के लिए चुना जाय उसमें पूरब से पश्चिम की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाले तीन-तीन राजमार्ग हों। इन छह राजमार्गों में नगर-निर्माण या गृह-निर्माण की भूमि का विभाग करना चाहिए। चारों दिशाओं में कुल मिलाकर 12 द्वार हों।

     नगर में चार दण्ड (24 फीट) चैड़ी रथ्याएँ हो, राजमार्ग, द्रोणमुख (चार सौ ग्रामों का मुख्य केन्द्र), स्थानीय (800 ग्रामों का केन्द्र), राष्ट्र, चारागाह, संयानीय, व्यापारी मंडियां, सैनिक छावनियाँ, शमशान और ग्रामों की ओर जाने वाली सभी सड़कों की चैड़ाई आठ दण्ड होनी चाहिए, जलाशयों तथा जंगलों की ओर जाने वाली सड़कों की चैड़ाई चार दण्ड होनी चाहिए। हाथियों के आने जाने का मार्ग और खेतों को जाने वाला मार्ग दो दण्ड चैड़ा होना चाहिए। रथों के लिए और पशुओं के चलने का रास्ता दो दण्ड चैड़ा होना चाहिए। मनुष्य तथा भेड़-बकरी इत्यादि छोटे पशुओं के लिए एक दण्ड चैड़ा रास्ता होना चाहिए।

     नगर के सुदृढ़ भाग में राजभवन का निर्माण कराना चाहिए। गृह भूमि के बीच से उत्तर की ओर नवें हिस्से में अन्तःपुर (राजभवन) का निर्माण करना चाहिए जिसका द्वार पूरब या उत्तर की ओर हो।

     इसके पूर्वोत्तर भाग में आचार्य, पुरोहित के भवन, यज्ञशाला, जलाशय और मन्त्रियों के भवन, रसोईघर, हस्तिशाला और कोष्ठागार (भण्डार) हों। उसके आगे पूरब दिशा में इत्र, तेल, पुष्पहार, अन्न, घी, निवास-स्थान होने चाहिए।

     दक्षिण-पूर्व दिशा में भण्डागार, राजकीय पदार्थों के आय-व्यय का स्थान और सोने-चाँदी की दुकानें होनी चाहिए।

     इसी प्रकार दक्षिण पश्चिम दिशा में शस्त्रागार और अन्य वस्तुओं को रखने का स्थान होना चाहिए।

     उनके आगे दक्षिण दिशा में नगराध्यक्ष, व्यापाराध्यक्ष, खदानों तथा कारखानों के निरीक्षक, सेनाध्यक्ष, शराब एवं मांस की दुकानें, वेश्या, नट और वैश्य आदि के निवास स्थान होने चाहिए।

     पश्चिम-दक्षिण भाग में ऊँटों तथा गधों के स्थान (तबेले) तथा व्यापार के लिए अस्थाई घर का निर्माण कराया जाय।

     पश्चिम उत्तर भाग में रथ और पालकी आदि सवारियों को रखने का स्थान होने चाहिए।

     इसके आगे पश्चिम दिशा में ही ऊन, सूत, बाँस और चमड़े का कार्य करने वाले, हथियार और उनके म्यान बनाने वाले और शूद्रों को बसाना चाहिए।

     उत्तर पश्चिम में राजकीय पदार्थों को बेचने-खरीदने का बाजार और औषधालय होना चाहिए।

     उत्तर पूरब में कोषगृह और गाय, बैल तथा घोड़ो के रहने का स्थान बनवाना चाहिए।

     उत्तर दिशा की ओर नगर-देवता, कुल देवता, लुहार, मनिहार और ब्राह्मणों के स्थान बनवाने चाहिए।

     नगर की ओर-छोर जहाँ खाली जगह छूटी है, धोबी, दर्जी, जुलाहे और विदेशी व्यापारियों को बसाया जाए।

     दुर्गा, विष्णु, जयन्त, इन्द्र, शिव, वरुण, अश्विनी कुमार, लक्ष्मी आदि देवताओं की स्थापना नगर के बीच में करनी चाहिए। कोष्ठागार आदि में भी कुल देवता या नगर देवता की स्थापना करनी चाहिए। प्रत्येक दिशा के मुख्य द्वार पर उसके अधिष्ठाता देवता की स्थापना की जाय। उत्तर का देवता ब्रह्मा, पूर्व का इन्द्र, दक्षिण का यम और पश्चिम का कुमार होता है।

     नगर की परिखा के बाहर कुछ दूरी पर चैत्य, पुण्यस्थान, उपवन और सेतुबन्ध आदि स्थानों की रचना और यथास्थान दिग्देवताओं की भी स्थापना की जाय।

     नगर के उत्तर में श्मशान होना चाहिए। दक्षिण दिशा में निम्न जाति के लोगों का श्मशान हो। पाषण्डों और चाण्डालों का निवास स्थान श्मशानों के ही समीप बनवाया जाए।

     नगर में बसने वाले परिवारों को उनके अध्यवसाय और उनके योग्य भूमि को देखकर ही बसाया जाय।

 

उपर्युक्त सन्दर्भों में आचार्य का यह कथन कि नगर में बसने वाले परिवारों को उनके योग्य भूमि को देख कर ही बसाना चाहिए, इस ओर संकेत देता है कि दुर्गीकृत नगर सभी के बसने के लिए नहीं था। साथ ही उन्होंने दुर्ग क्षेत्र के बाहर विविध प्रकार के वास्तु-संरचनाओं तथा श्मशान भूमि की अवस्थिति की बात भी कही, ये तथ्य हमें पुनः सैन्धव बस्तियों की भाँति दुर्ग एवं निचला नगर जैसे दो पृथक आवासीय योजना का स्मरण दिलाते हैं।

 

दुर्गीकृत नगर के अन्दर वर्णगत एवं पेशेवर जातियों की बस्तियों के सन्दर्भ में दिए गए आचार्य के निर्देश परम्पराओं पर आधारित होने के साथ ही अत्यन्त व्यवहारिक जान पड़ते हैं। वास्तुशास्त्र पर रचित 11वीं शती . के प्रसिद्ध ग्रंथ समरांगणसूत्राधार में नगर की आबादी के पेशेवर एवं वर्णानुसार बस्तियों की विन्यास-योजना का जैसा वर्णन है वह अधिकांशतः अर्थशास्त्र के विवरणों से साम्य रखता है। वहाँ भी नगरों के उत्तर में ब्राह्मणों को, पूरब में क्षत्रियों को, दक्षिण में वैश्यों तथा पश्चिम में शूद्रों को बसाए जाने का निर्देश है।35 इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय नगरों में वर्णगत् बसति योजना की यह दीर्घकालीन परम्परा थी। बहुत संभव है कि आचार्य ने उसी परम्परा का निर्वहन किया है। परन्तु इसके साथ ही नगर सन्निवेश सम्बन्धी आचार्य के निर्देश व्यवहारिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगते हैं। जैसे नगर के उत्तर पूर्व में यज्ञशाला के साथ पुराहितों की बस्ती तथा उनके समीप ही ब्राह्मण को बसाने के निर्देश तार्किक लगते हैं, क्योंकि बड़े किसी याज्ञिक अनुष्ठानों के अवसर पर आवश्यकतानुसार ब्राह्मण बस्ति से आसानी से ब्राह्मणों का यज्ञ-क्षेत्र में आना संभव था। वैसे ही राजभवन के प्रवेश द्वार के पूर्व दिशा में होने से तथा उसी दिशा में क्षत्रियों को बसाने की बात भी व्यवहारिक लगती है, क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर सेना के साथ इन लोगों का भी प्रासाद की सुरक्षा में सहयोग देना संभव था। नगर के दक्षिण में शराब की दुकानों तथा गजिकालय के साथ पुलिस के अधिकारियों एवं नगराध्यक्ष को बसाना उन पर नियंत्रण रखने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। अतः उपर्युक्त कतिपय उदाहरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि आचार्य की नगर सन्निवेश सम्बन्धी सुझाव परम्परा पर आधारित होने के साथ-साथ प्रकार्यात्मक उपयोगिता की दृष्टि से भी प्रासंगिक था।

 

जैसा कि ऊपर वर्णित है कि आचार्य ने नगर सन्निवेश का प्रारूप राज-प्रासाद को केन्द्र में रख कर निर्धारित किया।निशान्त प्रविधिनामक प्रकरण में उन्होंने राज-प्रासाद के वास्तुगत स्वरूप के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश दिया है। चँूकि आचार्य की मुख्य चिन्ता राजा की सुरक्षा को लेकर थी अतः वे राजप्रासाद तथा उसमें भी राजा के महल के रक्षा के उपायों के प्रति बड़े सजग दिखते हैं। उनके अनुसार अन्तःपुर (यहाँ अभिप्राय राज प्रासाद से है) का अपना स्वतंत्र प्राकार हो। इसके मध्य राजा का महल बनवाना चाहिए जिसकी दीवारों तथा गलियों का पता लगे। इसके बीच में राजा के रहने का निवास बनवायी जाए जिसमें आने-जाने के लिए गुप्त सुरंगें हों या तो फिर ऐसा महल बनवाये जाए जिसकी दीवारों के भीतर गुप्त मार्ग हो अथवा पोले खम्भों के भीतर आने जाने अथवा चढ़ने-उतरने का रास्ता हो अथवा आपत्तिकाल के निवारण के लिए यंत्रों के आधार पर ऐसा वासगृह बनवाये जिसको इच्छानुसार नीचे-ऊपर तथा इधर-उधर हटाया जा सकें, अथवा आपत्तिकाल के उपस्थित हो जाने पर ऐसे भवन का निर्माण करवाये। यदि राजा को इस बात की आशंका हो कि उसके समान ही दूसरे शत्रु राजा भी वास्तुकलाविद् है और वह गुप्तभवन-निर्माण सम्बन्धी सभी रहस्यों को जानता है तो वह अपनी बुद्धि के अनुसार उसमें परिवर्तन कर दे।

     यहाँ अग्नि शमन का उचित प्रबन्ध हो।

     राजा के निवास स्थान के पीछे रनिवास, उसके समीप ही प्रसूता, बीमार तथा असाध्य रोगिणी स्त्रियों के लिए अलग-अलग तीन आवास बनवाये जाएँ और उन्हीं के साथ छोटे-छोटे उद्यान एवं सरोवरों का निर्माण किया जाए। बाहर की ओर राजकुमारियों और युवक राजकुमारों के लिए स्थान बनवाये जाएँ।

     राजमहल के आगे हरी-हरी घास और फूलों से सजे हुए उपवन होने चाहिए। उसके बाद मन्त्रसभा का स्थान, फिर दरबार और तदन्तर राजकुमार, समाहत्र्ता-सन्निधाता आदि अध्यक्षों के प्रधान कार्यालय होने चाहिए।36

 

कौटिल्य ने राजप्रासाद के जिस वास्तुगत स्वरूप का निर्देश दिया है उसके मूलतः दो हिस्से प्रतीत होते हैं। जहाँ बाह्य भाग में बाग बगीचे, मन्त्रसभा, दरबार एवं विविध विभागों के कार्यालय होते थे वहीं आन्तरिक भाग राज परिवार के सदस्यों के निवासार्थ था। आचार्य ने यद्यपि राजप्रसाद के वास्तुस्वरूप के विषय में अपने सुझाव दिए परन्तु उन्होंने परिस्थिति के अनुसार राजा को स्वविवेक का उपयोग करते हुए इसमें परिवर्तन करने की पूरी छूट भी दी।

 

मौर्यों के राजप्रासाद का निर्माण उपर्युक्त मानकों के अनुरूप ही हुआ होगा। मौर्य राजप्रासाद के सन्दर्भ कतिपय स्रोतों से प्राप्त होता है। यूनानी लेखक एरियन ने इसकी भव्यता एवं सौन्दर्य का वर्णन करते हुए इसे सूसा और एकबताना के राजप्रासादों से बढ़कर कहा।37 पतंजलि ने भी चन्द्रगुप्त के सभा मण्डप का उल्लेख किया है।38 पुरातत्त्व से भी मौर्य सभा मण्डप के अवशेष मिले हैं। पटना के कुम्हरार से प्राप्त इस वास्तु संरचना में 10-10 स्तम्भों की 8 पंक्तियाँ है जो पूरब से पश्चिम की रेखा में है। इसके पूर्वी भाग में दो अतिरिक्त स्तम्भ मिले हैं, जो सम्भवतः सम्राट के इन्द्रासन के लिए थे। ये स्तम्भ खण्ड-खण्ड दशा में मिला है। प्रत्येक दो खम्भों में 15 फुट की दूरी है। किसी भी खम्भे में अधिष्ठान नहीं है उन्हें भूमि पर टिकाया गया था। उनकी डंडी गोल चिकनी है। उनके ऊपर की छत लकड़ी की बनाई गई थी और वह काष्ठ शिल्प के कई प्रकार के अलंकरणों से युक्त रहा होगा। इस मंच के एक ओर (दक्षिण तरफ) 15 फुट पर सात चबूतरों की पंक्ति पायी गई। ये चबूतरे लकड़ी के तख्तों से बने हैं।39 पुरास्थल से प्राप्त राख के ढेर से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह भवन अग्निकाण्ड का शिकार हुआ।40 काष्ठ के वास्तु संरचनाओं के प्रति कौटिल्य का भय इस प्रसंग में पूर्णतः सत्य सिद्ध होता है।

 

नगर के विविध हिस्सों में कोषगृह, कोष्ठागार, पण्यगृह, कुप्यगृह (अन्नागार), शस्त्रागार एवं कारागार जैसे महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण का सन्दर्भ भी अर्थशास्त्र में मिलता है। सन्निधातृनिचयकर्म प्रकरण में उनके वास्तुगत स्वरूप के विषय में निर्देश दिए गए।41 साथ ही साधारण मकानों के निर्माण सम्बन्धी कतिपय दिशा-निर्देश भी अर्थशास्त्र केवास्तु के गृहवास्तुकम्प्रकरण में वर्णित है।42 परन्तु विषय-विस्तार के भय से यहाँ उन सन्दर्भों को नहीं लिया गया है। प्रसंगवश यहाँ मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि आम घरों के निर्माण के सन्दर्भ में उन्होंने जो मानक दिए वे वर्तमान समय में भी पूर्णतः अनुकरणीय है।

 

इस प्रकार अर्थशास्त्र में नगर योजना सम्बन्धी विविध पक्षों के अवलोकन के उपरान्त निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आचार्य ने इस सम्बन्ध में जो भी सुझाव दिये हैं वे पूर्व परम्पराओं पर ही आधारित हैं। परन्तु उनके व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करने का प्रथम श्रेय उन्हें अवश्य जाता है। कौटिल्य ने नगर योजना में नगरों की सुरक्षा को सबसे पहले प्राथमिकता दी। नगर निवेश के अन्तर्गत विविध वास्तु-संरचनाओं एवं पुर वासियों के वर्ण एवं जातिगत भेद के आधार पर स्थान निर्धारण करते समय आचार्य ने उनके प्रकार्यात्मक उपयोगिता को विशेष महत्त्व दिया। चँूकि नगर राज्य के शौर्य प्रदर्शन का एक माध्यम भी होता था अतः उनके नागरक वास्तु विषयक सन्दर्भों में भव्यता सर्वत्र दिखती है। अर्थशास्त्र में वर्णित नगर-वास्तु सम्बन्धी ये परम्परा आगे भी चलती रही। भले ही विशुद्ध रूप से वास्तु-शास्त्र सम्बन्धी ग्रंथ मौर्य काल के कई शताब्दियों बाद लिखे गये, परन्तु अन्य साहित्य में बिखरे हुए वास्तु शास्त्रीय शब्दों से इस तथ्य की पुष्टि अवश्य होती है। कालान्तर में विशुद्ध रूप से इस विषय परमानसारएवंसमरांगणसूत्रधारजैसे ग्रंथ भी उन्हीं मानकों का निर्वहन करते हैं।

 

सन्दर्भ:

1ण्    केनाॅयर, जोनथन मार्क, एंशियण्ट सिटीज आॅफ दि इण्ड्स वेली सिविलाइजेशन, आॅक्सफोर्ड, 1998,     पृ. 52.

2ण्    वही।

3ण्    वही, पृ. 55; किरण कुमार थपल्याल एवं संकटा प्रसाद शुक्ल, सिन्धु सभ्यता, 2003 (षष्ठ संस्करण) लखनऊ, पृ. 49.

4ण्    केनाॅयर, जोनथन मार्क, पूर्वोक्त, पृ. 56; किरण कुमार थपल्याल एवं संकटा प्रसाद शुक्ल, पूर्वोक्त, पृ. 53.

5ण्    थपल्याल, किरण कुमार एवं संकटा प्रसाद शुक्ल, पूर्वोक्त 77-78.

6ण्    वही, पृ. 66 एवं 74-75.

7ण्    वही, पृ. 71.

8ण्    वही, पृ. 38.

9ण्    वही, पृ. 39.

10ण्   वही, पृ. 40.

11ण्   वही

12ण्   वही, पृ. 40-41.

13ण्   वही, पृ. 18.

14ण्   ऋग्वेद, 4.30.20.

15ण्   ऋग्वेद, 7.15.14.

16ण्   ऋग्वेद, 10.69.3.

17ण्   ऋग्वेद, 2.41.5.

18ण्   अग्रवाल, वासुदेवशरण, पाणिनिकालीन भारतवर्ष (अष्टाध्यायी का सांस्कृतिक अध्ययन) काशी, वि.सं. 2012, पृ. 142-143.

19ण्   वही, पृ. 142.

20ण्   वही, पृ. 144.

21ण्   अग्रवाल, पृथ्वीकुमार, प्राचीन भारतीय कला एवं वास्तु, वाराणसी, 2002, पृ. 68.

22ण्   वही, पृ. 70.

23ण्   चक्रवर्ती, दिलीप के., आर्कियोलाॅजी आॅफ एंशियण्ट सिटीज, आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, देलही, 1995, पृ. 244.

24ण्   वही, पृ. 247.

25ण्   कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्, वाचस्पति गैरोला (व्याख्याकार), वाराणसी, 2009 (पुनर्मुद्रित संस्करण), पृ. 286.

26ण्   वही, पृ. 85.

27ण्   वही, पृ. 85-86.

28ण्   वही, पृ. 86-90.

29ण्   अग्रवाल, पृथ्वीकुमार, पूर्वोक्त, पृ. 95.

30ण्   वही।

31ण्   वही, पृ. 97.

32ण्   वही।

33ण्   वही।

34ण्   कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्, पृ. 91-94.

35ण्   शुक्ल, द्विजेन्द्रनाथ, भारतीय वास्तु-शास्त्र ग्रन्थ प्रथम- वास्तु विद्या एवं पुर-निवेश, वास्तु-वाङ्मय- प्रकाशन-शाला, लखनऊ, पृ. 169.

36ण्   कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्, पृ. 65-67.

37ण्   अग्रवाल, पृथ्वीकुमार, पूर्वोक्त, पृ. 97.

38ण्   अग्निहोत्री, प्रभुदयाल, पतंजलिकालीन भारत, वाराणसी, विक्रम संवत 2022 (प्रथम संस्करण), पृ. 57.

39ण्   गुप्ता, एस.पी., दी रूट्स आॅफ इण्डियन आर्ट, देहली, 1980, पृ. 237-244.

40ण्   वही, पृ. 243.

41ण्   कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्, पृ. 95-96.

42ण्   वही, पृ. 286-287.

 

 

 

Received on 20.12.2018                Modified on 19.01.2019

Accepted on 05.03.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):251-259.